इस्लाम अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है , अल्लाह (ईश्वर ) को समर्पण । इस धर्म का उदय अरब जिसे आज सऊदी अरब कहते है , में हुआ । इसके प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद थे ।

इस्लाम के पूर्व अरब की स्तिथि – अरब देश में इस्लाम आने के पूर्व वहां के समाज मे अनेको बुराइया प्रचलित थी । लोग शराब में डूबे रहते थे , जुआ खेलते थे ,और लड़कियो को जन्म लेते ही ज़िंदा दफ़ना देते थे ।

ऐसी स्तिथि में ईश्वर ने एक महापुरुष को अरब में जन्म दिया , जिसे हम सब पैगम्बर मुहम्मद के नाम से जानते है । इन्हें मुसलमान आखिरी नबी और पैगम्बर मानते है ।

पैगम्बर मुहम्मद –

इनका जन्म अरब के मक्का स्तिथ कुरैश कबीले के हाशमी घराने में 22 अप्रैल 571 ईसवी को हुआ । इनके पिता का नाम अब्दुल्ला एवं माँ का नाम आमना था ।

माना जाता है , कि इनके पिता की मृत्यु इनके जन्म के पूर्व ही हो चुकी थी । इनका लालन पालन इनके दादा अब्द अल मुत्तलिब और चाचा अबु तालिब की देख रेख में हुआ ।
इनका घराना कुरैश का सबसे अधिक प्रतिष्ठित घराना था ।

मुहम्मद जब बड़े हुए तो उन्होंने अरब के समाज मे फैली सामाजिक बुराइयों को देखा । वे उन बुराइयों को खत्म करने का समाधान खोंजने लगे । वे लोगो को समझाते कि सभी अपना बराबर धन रखो,सूद और ब्याज मत लो । लड़कियों को जन्म लेते ही गाड़ो मत बल्कि उनका बहुत अच्छे से लालन पालन करो । कुछ लोग उनकी बात समझते तथा कुछ उनका बहुत विरोध करते ।

मुहम्मद समाज की इन बुराइयों के समाधान के लिए मक्का के निकट हिरा नाम की एक पहाड़ी चोटी पर जाकर चिंतन मनन करते । और ईश्वर से प्रार्थना करते कि वो समाज की इन बुराइयों को खत्म करे ।

ऐसा करते हुए चालीस वर्ष व्यतीत हुए । जब वे चालीस वर्ष के थे , तब 610 ईसवी में एक दिन उन्हें अपने अंदर ज्ञान के प्रकाश की अनुभूति हुई ,

एवं देवदूत जिब्रील ने उन्हें बताया कि ईश्वर ने उन्हें नबी (सिद्ध पुरुष ) और रसूल (देवदूत) बनाकर भेजा है । और उन्हें कहा कि वो लोगो को ईश्वर का यह संदेश सुना दे , कि वे लोग जुआ, शराब , लड़कियों को ज़िंदा दफ़नाना आदि बुराइयों से दूर रहे । सूद न ले । और ईश्वर के नाम पर पाखण्ड न करे , ईमानदारी से मेहनत करे और एक ईश्वर (अल्लाह ) की उपासना करें ।

जब मुहम्मद ने इन बातों का प्रचार प्रारम्भ किया तब उनका बहुत विरोध हुआ । इसके कई कारण थे , सूद लेने वालों को लगा कि उनका धंधा चौपट हो जाएगा ,जो लोग लड़कियों को दफनाते थे वो सोच में पड़ गए कि अब लड़कियों को भी पालना पड़ेगा ।

ये सब चीज़े उन लोगो के उस प्रकार के जीवन जिसमे अनावश्यक लोभ और आराम था , उसके विपरीत थी । इसलिए मक्का के अमीर वर्ग ने बहुत विरोध किया और गरीबो को उनके बुतो मतलब पुतलो का वास्ता देकर मुहम्मद के विरुद्ध करने का प्रयास किया ।

पर मुहम्मद ने अपना समाज सुधार नही छोड़ा । मक्का से कुछ दूर पर मदीना में कुछ लोगो को उनकी बातें समझ मे आयी और उन्हें लगा मुहम्मद एक सच्चे आदमी है । और उन्होंने उन पर ईमान ले आये अर्थात उनकी बात मान ली । मक्का वालो के इस विरोध के कारण मुहम्मद ने मदीने जाने का निश्चय किया ,

और सन 622 ईसवी में मक्का से हिज़रत अर्थात पलायन करके मदीना में पहुचे । वहां के लोगो ने उन पर ईमान लाया और उनको अपना खलीफा चुन लिया ।

उसके कुछ समय पश्चात मुहम्मद ने मक्के पर हमला कर दिया । इसमे उनके भाई और दामाद अली इब्ने अली तालिब ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । और अंततः मक्का पर विजय प्राप्त कर ली गयी । उनके सभी विरोधियो ने अन्ततः उन पर ईमान ले आये और पूरा अरब एक सूत्र में बंध गया । सभी इस्लाम के नियमो के अनुसार एक सभ्य जीवन जीने लगे ।

मुहम्मद साहब की कुल 11 पत्निया रही । तथा उनकी संतानो में फतमातु ज़हरा अत्यंत ख्याति प्राप्त रही । जिनका विवाह मुहम्मद ने अपने चचेरे भाई अली इब्ने अबु तालिब से किया । इनके दो नवासे रहे , हज़रत हसन और हज़रत हुसैन जिन्हें कर्बला के मैदान में शहीद कर दिया गया था ।

मक्के पर विजय के उपरांत भी मुहम्मद ने अपना घर मदीने को बनाया और 8 जून 632 ईसवी को मात्र 61 वर्ष की आयु में मदीने में ही प्राण त्याग दिए ।

उसके उपरांत इस्लाम के एकत्रीकरण को उनके श्वसुर हज़रत अबू बकर सिद्दीक, हज़रत उमर फ़ारूख़ , हज़रत उस्मान ए गनी और उनके भाई एवम दामाद हज़रत अली इब्ने अबु तालिब ने संभाला ।
ये चारो उनके खलीफा कहलाते है , और इनकी खिलाफत को ख़िलाफ़त ए राशिदूंन या खिलाफत ए राशदा कहते है । राशदा का अर्थ होता है , एकदम सही और सीधे मार्ग पर चलने वाली खिलाफत ।

पर्व एवं त्योहार – इस्लाम मे मुख्यतः ईद के रूप में एक त्योहार मनाया जाता है , जो इस्लामी महीने रमज़ान के खत्म होने के अवसर पर मनाया जाता है । रमज़ान के दौरान मुसलमान दिन में निर्जल व्रत रहकर सन्ध्या में अपने दैनिक व्रत का पारण करते है । इस पारण को इफ्तार कहते है , इएलिये इस ईद को ईद उल फितर कहा जाता है । इस माह में ही इस्लाम की धार्मिक पुस्तके कुरआन नाज़िल हुई थी ।

इस्लाम मे इसके अतिरिक्त एक और ईद मनाई जो अरबी साल के आखिरी जिल्हज माह में मनाई जाती है । ये ईद क़ुरबानी की ईद होती है , जो हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माइल की याद में मनाई जाती है । इसमे मुसलमान बकरे आदि की क़ुरबानी करते है ।

मुहर्रम जो इस्लामी साल का पहला महीना है , इसे मुहम्मद के नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिवार व 72 जाँनिसार के ग़म में मनाया जाता है । विशेषकर इस्लाम का शिया समुदाय इस महीने में काले कपड़े पहनता है , रोज़े रखता है , इमामे आली मकाम की याद में मजलिसे करता है ।

इस्लाम मे शाबान माह की चौदह तारिख को शब्बे रात मनाई जाती है । इस्लामिक मान्यता के अनुसार इस रात अल्लाह अगले वर्ष की किस्मत का फैसला करता है ।
इस रात मुसलमान नमाज़ पढ़ते है , और अल्लाह की इबादत में रात भर जाग कर गुज़ारते है ।

पांच फ़र्ज़ –

इस्लाम मे हर मुसलमान के लिए पांच फ़र्ज़ बताये गए है , जो हर मुसलमान को करने ही चाहिए –

1. नमाज़- प्रत्येक मुसलमान को पांच वक़्त की नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है ।

2. रोज़ा – प्रत्येक मुसलमान को रमज़ान के पूरे महीने उपवास अर्थात रोज़ा रखना चाहिए , जिसमे वे लोग दिन में कुछ नही खाते , फिर शाम को पारण करते है ।

3. ज़कात- अपनी आय का ढाई प्रतिशत ज़रूरतमन्दो के लिए दान करना चाहिए, ये प्रत्येक मुसलमान के लिए आवश्यक है ।

4. हज – प्रत्येक मुसलमान को मक्का स्तिथ काबा शरीफ की यात्रा अपने जीवन मे एक बार अवश्य करनी चाहिए । यह यात्रा करने का सबसे उत्तम माह माह ए जिल्हज है ।

5. ज़िहाद – बुराई का विरोध और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष को ज़िहाद कहते है । प्रत्येक मुसलमान को अपने अंदर और बाहर की बुराई से लड़ना चाहिए ।

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