कर्मयोग – अवसाद (depression) से युद्ध

कर्मयोग यह शब्द आप सभी ने सुना होगा ,आप सब इसका अर्थ जो लोक प्रचलित हैं , मात्र यह कि “कर्म करो फल की चिंता मत करो” बस यह लगाते है ।

यह कर्मयोग का प्रारंभिक पाठ हो सकता हैं , पर पूर्ण कर्मयोग नही । पूर्ण कर्मयोग का वर्णन करने का सामर्थ्य तो मै नही रखता , पर गीता में योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने जो कर्मयोग का वर्णन किया है , आज हम उस पर एक दृष्टि डालने का प्रयत्न करेंगे ।

हाल ही में आप सब ने सुना होगा कि एक जबरदस्त अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत जिन्होंने अपनी मेहनत और एक्टिंग के बलबूते बॉलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी , उन्होने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली । सूत्रों से पता चला हैं , कि वो अवसाद अर्थात डिप्रेशन की स्तिथि से गुज़र रहे थे ।

तो मित्रो कर्मयोग वह रामबाण है , जो डिप्रेशन या अवसाद के असुर के लिये रामबाण है । अब हम ये देखते है, कि ये कर्मयोग है क्या ? और कैसे इससे हम आज अपनी जिन्दगी आसान बना सकते है ।

कर्मयोग

कर्मयोग के बारे में अक्सर यह कहा जाता है , कर्म करो फल की चिंता मत करो । पर बिना फल की इच्छा या चिंता के कोई कर्म हो सकता है , क्या ।

असल बात यह है, कि हम इस बात के मर्म को नही समझ पाए , अगर फल के बारे मे नही सोचेंगे तो उद्देश्य से भटकने की संभावना है , फल की चिंता न करने के अर्थ है , की फल से उतना अधिक लगाव मत लगाओ कि यदि असफल हुए तो तुमको बहुत दुख हो । क्योंकि यही दुख अवसाद का रूप लेता है, और फिर आत्महत्या जैसी घटनाएं हमारे सामने आती है ।

और दूसरा कारण फल पर कर्म की अपेक्षा अधिक ध्यान केंद्रित करना , हमे अपने अभीष्ट को प्राप्त करने के लिए बनाई गई योजना पर पूरे मन से केंद्रित हो कर काम करने से रोक सकता है , जिससे हम अभीष्ट तो दूर की बात है , अपनी क्षमता से भी निचले स्तर का परिणाम प्राप्त करते है , या असफल हो जाते है ।
अगर हम व्यवहारिक तौर पर देखेंगे तो स्वतः ही कर्मयोगी होते जाएंगे , मैं बताता हूँ , कैसे –

१. सबसे पहले ये सोचिये कि आप जो भी करने जा रहे है , क्या उसका परिणाम आपके हाथ मे है , जवाब मिलेगा नही । उसका परिणाम या तो अच्छा हो सकता है या बुरा । ठीक ।
अब दो रास्ते है , आपके पास या तो कर्म करिये और अच्छे या बुरे परिणाम को भोगने के लिए तैयार रहिये ।
और दूसरा कर्म ही नही करिये ।

पहले मार्ग में संभावना हैं, कि आप असफल हो सकते हो पर दूसरे मार्ग में यह निश्चित है , कि आप असफ़ल होंगे ही । क्योंकि जो कर्म ही नही करेगा उसके लिए क्या सफलता और क्या असफलता । तो कोई भी समझदार मनुष्य वो मार्ग चुनेगा जिसमे सफलता की आशा या सम्भावना तो हो , मतलब आप कर्म करेंगे ।

२. तो जब आप कर्म करेंगे तब आप देखिए केवल आपके हाथ मे कर्म होगा उसके परिणाम में कई प्रकार के कारण प्रभाव डालेंगे सबसे पहले आपकी मेहनत , फिर आपके विरुद्ध आपके प्रतिद्वंदी आपको असफल करने के लिए षड्यंत्र भी कर सकते है , और आपके पूर्व जन्मो के कर्म आदि ।

तो इसका अर्थ हुआ कि जो कर्म आप कर रहे है , उसके फल पर विभिन्न परिस्थितियों और व्यक्तियों का प्रभाव पड़ता है , तो फल के लिए आप पूर्णतः ज़िम्मेदार नही हो सकते चाहे वह फल सकारात्मक हो या नकारात्मक ।

तो कर्म को पूरी निष्ठा से करिये और जो भी फल हो उस पर न खुश होइए न दुखी क्योंकि उसके ज़िम्मेदार आप पूरी तरह से है ,ही नही । इसे गीता में कहा गया है, “अकर्ता भाव” । यह भाव ऱखते हुए कर्म करने पर आपको परिणाम से न दुख होगा न खुशी ।

इस भाव को रखेंगे तो जो बात पहले पॉइंट में कही वो स्वाभाविक रूप से आ जायेगी और परिणाम का भय निकल जायेगा और जैसे ही भय निकलेगा तो आप स्वतः ही देखेंगे उत्कृष्ट परिणाम आएंगे और नही भी आये तो इससे आपको ज़रा भी फर्क नही पड़ेगा ।

यही कर्मयोग है । अब आगे कुछ बाते कहूँगा , जो महत्वपूर्ण है , कर्म करने के बाद कुछ लोग परिणाम का इंतजार करते हैं , वह मत करिए अपनी उन्नति के लिए अगले कर्म करने के लिए आगे बढ़ जाये क्योंकि फल की इच्छा तो छोड़ ही दी अब वो अच्छा हो या बुरा हमे क्या ।

कर्म को करते समय जो आनंद मिला , जो सीखने मिला उसे ही उसका फल मानिये और अगर उसका सच मे अच्छा परिणाम मिल जाये तो उसे बोनस मानियेगा ।

स्वयं को एक महापुरुष के तौर पर देखिये , जैसे इस संसार मे महापुरुषों को कष्ट उठाने पड़ते है , बल्कि मैं तो कहूँगा कि महापुरुषों को सामान्य लोगो से अधिक कष्ट उठाने पड़ते है , यही सोचकर यह मानकर कि आप की लाइफ एक फ़िल्म है , और आप उसके हीरो हो हर अच्छी बुरी स्तिथि में खुश रहिये । इससे आप सुख और दुख को एक समान मानने लगेंगे । और यही संदेश तो भगवान श्री कृष्ण ने गीता में भी दिया है, –

“लाभ – हानि , जय – पराजय , सुख -दुख , मान – अपमान , शीत-उष्ण सभी को समान समझकर युद्ध करो।”

अर्थात इन सभी को समान समझकर कर्म करो , क्योंकि अगर इनको समान नही समझा तब भी फल आपके हाथ मे नही है, और फिर असफल हुए तो दुख भी आपको झेलना पड़ेगा या डर से आप कर्म ही नही करोगे , इससे अच्छा है , कर्म करिये और जो भी परिणाम हो उसे खुशी से स्वीकार करिये । इन सबको समान समझा तो डिप्रेशन होगा ही नही क्योंकी डिप्रेशन जहाँ से शुरू होता है ,

आप वह जड़ ही काट देंगे , फिर तो डिप्रेशन तो दूर की बात है , आप इतने आनन्द में रहेंगे कि सफ़लता से मिलने वाले आनन्द की आपको आवश्यकता ही नही होगी और अगर सफलता मिल गयी तो उसका आनंद कर्मयोग के आनंद के आगे कुछ भी नहीं होगा ।
” जय श्री कृष्ण “

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