आज अगर यह पोस्ट आपने पढ़ी और अपने जीवन मे उतारने का प्रयास गलती से भी कर लिया न, तो यकीन मानिए आपकी ज़िंदगी मे अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन होगा । और यदि इसे अभ्यास मतलब प्रैक्टिस में लाये तो तैयार हो जाइए फिर सामान्य जीवन (Ordinary Life) से विशिष्ट जीवन (Extra Ordinary Life) जीने के लिए ।
तो टॉपिक पढ़ के पता चल गया होगा कि हम भय मतलब डर के बारे में बात करने वाले है ।
मैंने एक मोटिवेटर से सुना था , कि हमारी सफलता और असफलता के बीच मे एक बहुत ही कमज़ोर अदृश्य दीवार होती है, हमारे डर की ।
वह होती तो बहुत कमजोर है , पर हम उससे इतना डरते है, कि उसे तोड़ने की कोशिश ही नही करते ।
संक्षिप्त में सफल होना बहुत आसान है, अगर हम अपने अंदर के भय को समाप्त कर दे , यही वह दीवार हैं , जो हमारी सफलता , खुशियो और दुख व असफलता के बीच मे खड़ी है ।
मैने उन्ही प्रेरक व्यक्ति से एक प्रेरणाप्रद कहानी सुनी थी , जिससे हम अपने टॉपिक को और अच्छे से समझ पायेंगे ।

कहानी –
जब मै छोटा बच्चा था ,मेरे लिए पूरी दुनिया एक खेल के मैदान के समान थी । एक परम आनंद की स्तिथि में था । फिर जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ , मेरे आस पास दीवारे खड़े होने लगी , नौकरी , कैरियर और मैने देखा उन दीवारों से पूरी दुनिया घिरी है, और सब आगे बढ़ने के लिए, एक दूसरे को पीछे करने के लिए भागे जा रहे है ।
वही पास एक सीढी थी , लोग उसमे चढ़े जा रहे थे, आगे बढ़े जा रहे थे । मुझे समझ नही आ रहा था ,कि मेरी वो आज़ाद दुनिया कहाँ चली गयी । वो दुनिया जिसमे मैं कही भी आज़ादी से रहता था, बिना किसी चिंता के ।
मैंने सोचा कि शायद उस सीढ़ी के ऊपर पहुँच जाऊ ,तो मै अपनी पुनः अपनी उसी दुनिया में वापस लौट सकता हूँ, मैं सीढिया चढ़ने लगा , हर एक सीढ़ी सफलता की सीढी थी , कुछ न कुछ हासिल होता , पैसे , लक्ज़री लाइफ पर हर सीढ़ी के साथ डर लगने लगता कि मै गिर तो नही जाऊंगा , मेहनत कर कर के मैं एक एक सीढी ऊपर चढ़ता गया । मतलब की तरक्की करता गया । पर जैसे जैसे आगे बढ़ रहा था ,डर और बढ़ता जा रहा था , पर मै आगे बढ़ता गया यह सोच कर की शायद इस सीढी के उस पार मुझे मेरी वही दुनिया मिल जाएगी । पर हर सीढी के साथ डर बढ़ता गया, गिरने का । और लोग कम होते गए , उसी तरह जैसे उच्च स्तर की पोस्ट पर कम लोग होते है और निचले में ज्यादा ।
पर मुझे वो ज़िन्दगी नही मिली जो मैं छोड़ के आया था । अन्ततः मैं सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर पंहुचा वहां केवल कुछ लोग रहे , जो बहुत डरे हुए थे , उनके पास सब कुछ था , पर बहुत डर और दबाव में थे । हर क्षण उन्हें यह डर था , कि उनकी ये पोस्ट न छिन जाए, या यहां से गिरे तो बहुत दुख होगा ।
यहां पर भी वह निश्चिन्तता वाला जीवन नही था , जिसके लिए मै यहां तक पहुँचा , वह लोग मुझे कह रहे थे , कि यहां रहो और जो लक्ज़री है, उसे भोगो ।
पर मुझे तो वही निश्चिंतता चाहिए थी , जो मै बचपन में छोड़कर आया था , इसलिए मैं नीचे की तरफ भागा बाकियो को बताने के लिए की ऊपर कुछ नही है । मैं उन्हें समझाता रहा , पर कोई नही माना सब डरे हुए भागे जा रहे थे ।
फिर मैंने सोचा अब चाहे जो हो जाये मैं इस दीवार को तोड़ कर रहूंगा , मैने पूरी शक्ति से उस दीवार की ओर दौड़ लगाई और मैं उसके पार चला गया , जैसे कोई पानी के पार जाता है, जैसे वहां कोई दीवार ही न हो । और जैसे ही मैं उस पार गया, मैंने देखा वही निश्चिन्तता से भरी दुनिया और मैंने देखा वहां पर बच्चे वैसे ही खेल रहे है, जैसे उस दुनिया मे खेल रहे थे ।
और फिर मैंने खुद को देखा तो पाया कि मैं भी बच्चा बन गया हूँ ।
तो अब आप लोग इस कहानी से कुछ चीज़ें समझ गए होंगे कि हमारे और हमारी सफलता के बीच केवल हमारा डर होता है, जो अदृश्य दीवारों के रूप में हमे खुश होने से रोकता है ।
नौकरी जाने का डर, फैल हो जाने का डर यह डर ही हमे हमारा बेस्ट देने से हमे रोकता है ।
अपने काम को खेल की तरह करिये जैसे एक बच्चा हर चीज़ में खेल और उत्सुकता दिखाता है वैसे । आपको अंदर से अनुभव होगा कि आप सफल है ,आपको सफलता के लिए कुछ अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नही ।
जो होना है, वो तो होकर रहेगा आप बस निश्चिंत होकर अपना काम करिये जितने अच्छे तरीके से आप कर सकते हो एकदम बिना डरे न ही यह डर की बॉस क्या कहेंगे और न ही यह कि टाइम पर पूरा नही हुआ तो । बस सीखने के उद्देश्य से हर काम को करिये , बिना कुछ खोने के डर से जो चले गया या जाने वाला है , उसे जाने दीजिए आप बस बिना डरे अपना काम करते रहिए । आप अनुभव करेंगे कि आप को सफलता मिले या असफलता आप कुछ न कुछ सीखेंगे ।
इस बात का डर तो बिल्कुल नही रखिये कि लोग कहेंगे कि आपको आता नहीं है ।क्योंकि अगर डर हुआ तो सीख नही पाएंगे और जीवन भर उन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा ।
तो डर की दीवार को तोड़िये और बस सीखने के लिए काम करिये और आगे बढते रहिये ।

News Reporter
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