श्रमण सभ्यता (जैन धर्म)

श्रमण – श्रमण शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है , वह व्यक्ति श्रम के द्वारा मोक्ष को प्राप्त
करने में आस्था रखता हो । जिसकी यह मान्यता हो कि परम पद को प्राप्त करने के लिए
केवल स्वयं का प्रयास पर्याप्त होता है , ईश्वर जैसी कोई वस्तु इस संसार मे नही है ,
मनुष्य ही स्वयं तप करके ईश्वरत्व ग्रहण कर लेता है ।

इसके अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नही है , श्रमण कहलाता है । इस धर्म एवं सभ्यता को
अनीश्वरवादी सभ्यता भी कहते है । इस सभ्यता के अनुयायी वेदों को प्रमाणिक नही
मानते इसलिए इन्हें नास्तिक सम्प्रदाय या अनीश्वरवादी माना जाता है ।

सम्प्रदाय –

जैन एवं बौद्ध दोनो ही मान्यताओ के व्यक्ति श्रमणों में आते है ।

मान्यता –

जैन मान्यता के अनुसार प्रकृति एवं जीव दोनो ही अनादि है , दोनो में से किसी ने किसी को
उत्पन्न नही किया । मोक्ष प्राप्त करने का साधन केवल कठोर तप है ।

उदय –

महाभारत के भीषण युद्ध मे जब हमारा सारा ज्ञान विज्ञान नष्ट हो गया । और हो भी क्यों न
जब भाई भाई के विरुद्ध शस्त्र उठा ले तब विनाश के सिवा क्या अपेक्षा की जा सकती है ।
तब ब्राह्मणत्व कर्म नही अपितु जन्म के आधार पर मिलने लगा ,

उस समय कुछ लालची ब्राह्मण जिन्हें केवल ब्राह्मण कुल में जन्म के कारण वेदों का गलत भाष्य
करने लगे एवं स्वयं को भू देव अर्थात इस धरती का देवता कहने लगे ।

राजाओ के द्वारा भी इन्हें संरक्षण प्राप्त था , इसलिये ये पूर्णरूप से निरंकुश हो गए , क्योंकि
उस समय के राजा इनके वचन को ही वेद वाक्य मानकर स्वीकार कर लेते थे ।

पशु बलि युक्त हिंसा पूर्ण यज्ञ करने लगे ।इन्ही में से कुछ लोगो ने वाम मार्ग चलाया जिसमे पांच
मकारों के सेवन को ही परम् सुख माना वे पांच थे – मांस , मदिरा , मैथुन ,मीन, एवम मुद्रा ।
इन पाँचो को प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के साधन का प्रयोग करना उचित
एवम धर्म माना जाने लगा ।

वेदों के इस प्रकार गलत अर्थ को ही वेद का मार्ग समझ कर कुछ बुद्धिजीवियों विशेष कर
बौद्धो एवं जैनो ने समझा की यही वेद में लिखा है, जो ये लोग कर रहे है,
तो उन लोगो ने उस आधार पर वेद का ही विरोध करना प्रारम्भ कर दिया ।

इस प्रकार उन वाममार्गियों के विपरीत कठोर ब्रह्मचर्य एवम तप से युक्त मार्ग की स्थापना की
जो जैन एवं बौद्ध धर्म के रूप में हमारे सामने आया । इस प्रकार इन दोनो मतो ने वेद का
विरोध करना प्रारम्भ कर दिया ।

और वेद को ही ईश्वर की वाणी माना जाता है हमारे आर्यावर्त भारत मे जो कि बौद्धो एवं जैनो
के पूर्वज भी मानते आए है इसलिए इन्होंने ईश्वर को भी मानना अस्वीकार कर दिया ।

जैनियो ने कुछ स्वार्थी वैदिक धर्मी जो पशुबलि युक्त यज्ञ करते थे , उस हिंसा को वेद का मार्ग
मानकर वेद का विरोध प्रारम्भ किया और अपने सम्प्रदाय में अहिंसा के कठोर पालन पर बल दिया ।
जैन धर्म की इन मान्यताओ को स्थापित करने वाले भगवान महावीर थे ।
इनका जन्म 563 ई. पू. में हुआ था ।

जैन धर्म-

जैनियो का मानना है ,इनका धर्म बहुत पुराना है , पर ये पूर्ण सत्य नही है , इनका वेद विरोध
ढाई हजार वर्ष पूर्व ही प्रारम्भ हुआ है , अन्यथा इनके पूर्वज भी वैदिक धर्मी ही थे ।
इनके प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ऋषभदेव जिन्हें वैदिक धर्मी भगवान का अवतार मानते है ।
अतः इनकी वेद विरोधी अनीश्वरवादी मान्यता कुछ काल पूर्व की ही है । ये कहते है, कि वेदों को
प्रामाणिक नही माना जा सकता , मनुष्य को स्वयं तप करके अपने अनुभवों को प्रामाणिक मानना चाहिए ।

सिद्धांत –

भगवान महावीर ने जैनियो के लिए कुछ नियमो का स्थापन किया , जिनके द्वारा श्रमण कैवल्य
अथवा मोक्ष तक पहुंच सकता है ।
1. श्रमण को समस्त इन्द्रिय सुखों का त्याग करना होता है । एवं कठोर ब्रह्मचर्य का पालन
करते हुए रहना होता है ।
2. वस्त्रो का भी पूर्ण रूप से त्याग करना होता है ।
3. सुस्वादु भोजन का त्याग करके केवल शरीर को चलाने के लिये आवश्यक सादा भोजन करना होता है ।

सम्प्रदाय –

वैदिक धर्मियो की तरह जैनियो में अनेक सम्प्रदाय है , जो अपनी अपनी मान्यताओं के आधार
पर एक दूसरे से अलग हुए , उनमे से मुख्य इस प्रकार है –

दिगम्बर –

ये सबसे पुराना सम्प्रदाय है , जो भगवान महावीर के सिद्धांतों का उसी प्रकार पालन करता है ,
जिस प्रकार उन्होंने किया । कठोर तप के अनुसार जीवन यापन करना एवं पूर्ण रूपी से निर्वस्त्र रहना ,
सभी सांसारिक वस्तुओ का एवं वस्त्रो का भी त्याग कर देना इनके नियमो में आता है ।
अहिंसा इस धर्म का मूल हैं ।

श्वेताम्बर –

इन साधुओ ने माना कि निर्वस्त्र रहने की आवश्यकता नही श्रमण श्वेत वस्त्र धारण करके भी
कैवल्य अर्थात मोक्ष तक पहुँच सकता है । ये भी कठोर तप में पूर्ण विश्वास करते है ।
पूर्ण रूप से अहिंसा का पालन करते है ।

अपने मुँह को भी श्वेत कपड़े से ढक के रखते है ,
ताकि कोई जीव गलती से भी उनके मुख में जाकर हिंसा का शिकार न होय ।
ये भी अहिंसा के पूर्ण पक्षधर है । परंतु ये दिगम्बर से अधिक प्रगतिवादी विचार धारा के है ।

णमोकार मन्त्र-

इनके सारे धर्म शास्त्र प्राकृत अथवा पाली भाषा मे लिखे गए है , उसी भाषा मे ये मन्त्र लिखा
गया है ।
इस मन्त्र को प्रत्येक जैन पूर्ण श्रद्धा से सम्मान देता है । इस मंत्र में पंच परमेष्ठी को नमन
किया जाता है । वह इस प्रकार है –

1. सभी अरिहंतो को नमस्कार है ।
2.सभी सिद्धो को नमस्कार है ।
3. सभी आचार्यो को नमस्कार है ।
4. सभी उपाध्यायों को नमस्कार है ।
5 . इस लोक के सभी साधुओ को नमस्कार है ।

तो हम देख सकते है , इस धर्म के मूल मंत्र में किसी भी प्रकार के ईश्वर का वर्णन नही है ,
ये केवल उन सिद्धो को नमस्कार करते है , जो श्रम करके जिन पद तक पहुँच गए ।

जिन पद –

जिन उसे कहते है , जिसने तप करके अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लिया है ।
भगवान महावीर को मिलाकर ईस धर्म मे 24 जिन अथवा तीर्थंकर है ।

वासुदेव पद –

जैन धर्म मे वासुदेव उसे कहते है , जिसके अंदर जन्म से ही ईश्वरीय गुण प्रकृति द्वारा विद्यमान हो ।
भगवान कॄष्ण एवं भगवान राम को भी जैन धर्म मे वासुदेव मानकर सम्मान दिया जाता है ।

अभिवादन –

जैन धर्म मे सभी मुख्य रूप से एक दूसरे को “जय जिनेन्द्र ” कहकर अभिवादन करते है ।

धर्म ग्रंथ –

मोक्ष शास्त्र” इनका मुख्य धर्म ग्रंथ है । इसके अतिरिक्त “रत्नाकर प्रभाकर ” अन्य ग्रंथ है ।
जो मुख्यतः पाली अथवा प्राकृत भाषा मे लिखे गए थे ।

महत्वपूर्ण व्यक्ति –

अखंड भारत के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में जैन धर्म अपना
लिया था । उनके पुत्र सम्राट बिंदुसार के बारे में भी यही बात प्रचलित है ।

पंच महाव्रत –

जैनियो में पंच महाव्रतों का पालन करना अति आवश्यक माना गया है , ये इस प्रकार है –

१. अहिंसा – किसी भी प्रकार की हिंसा नही करना ।

२. अस्तेय – चोरी नही करना ।

३. अमृषा – झूठ नही बोलेना ।

४. अपरिग्रह – किसी भी प्रकार का धन इकट्ठा न करना ।

५. ब्रह्मचर्य – कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना । अपनी समस्त इन्द्रियों पर वश रखना विशेषकर कामवासना में न पड़ना ।

* जैनियो में स्वस्तिक चिन्ह को अति महत्वपूर्ण माना गया है ।
*”अहिंसा परमो धर्म: इनका मूल मंत्र है ।

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