History – सम्राट पृथ्वीराज चौहान

इतिहास (पृथ्वीराज चौहान )

आज हम बात करते है, भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट जिन्हें अंतिम हिन्दवी शासक भी कहा जाता है,
वो है सम्राट पृथ्वीराज चौहान।

पहले मैं आपको उनके वंश के बारे में बता दूं , वो अग्नि वंश के चौहान थे। आबू पर्वत में ऋषियो द्वारा
एक यज्ञ किया गया था,
ऐसे क्षत्रियो को तैयार करने के लिए जो देश एवं धर्म की रक्षा कर सके, उसी यज्ञ से चार अग्निवंशी
क्षत्रिय वंशो का जन्म हुआ
जिसमें प्रतिहार, परमार, चालुक्य या सोलंकी और चतुर्भुज चौहान थे।


एक मान्यता ये भी है , कि कुछ विदेशियो को ऋषियो ने यज्ञ द्वारा शुद्ध करके देश एवं धर्म की रक्षा के
लिए चुना ये चारों वही क्षत्रिय थे। परंतु सार्वभौम मान्यता के अंतर्गत चौहान भारतीय आर्य मूल के
ही थे, हम में से ही थे। क्योंकि जो देशभक्ति चौहानो में इतिहास ने देखी है, वो कोई अपना ही दिखा सकता है।

अब बात करते है , सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जिनका जन्म 1163 ईसवी को माना जाता है ,
वैसे आज भी कई इतिहासकारो में इनके जन्म को लेकर विवाद है ।

इनके पिता का नाम सम्राट सोमेश्वर चैहान एवं माता का नाम करपूरीदेवी था ।
इनका राज्याभिषेक 1178 ईसवी को हुआ ।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कुल 13 रानिया थी, जिनमे संयोगिता अति प्रसिद्ध है ,
जो गहड़वाल वंश की थी एवं सम्राट के मौसेरे भाई जयचन्द की पुत्री थी ।
सम्राट के नाना चन्द्रवंशी महाराज अनंगपाल जो उस समय दिल्ली के शासक थे, वो सम्राट के कम आयु में ही
साहसिक कार्यो से अत्यंत प्रभावित हुवे ।

महाराज अनंगपाल की दो पुत्रिया थी , उनमे से एक अजमेर के महाराज सोमेश्वर चौहान को तथा एक
कन्नौज के महाराज विजयपाल को ब्याही थी ।

उन्होंने सम्राट के पिता और अजमेर के महाराज सोमेश्वर चौहान से पृथ्वीराज को दिल्ली के
सिंहासन का उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा प्रकट की सम्राट के पिता को यह बात अच्छी
लगी परन्तु उसी समय जयचन्द जो सम्राट का मौसेरा भाई एवं कन्नौज का राजा था,
वो अपने नाना के इस प्रस्ताव से बहुत क्रोधित हुआ क्योंकि वो उनका बड़ा नाती था
और नीतिपूर्वक उसे अपने नाना का उत्तराधिकारी होना चाहिए था ।

परन्तु महाराज अनंगपाल का कहना था , जो योग्य होगा उसी को दिल्ली का सिंहासन दिया
जाएगा और उस समय कुँवर पृथ्वीराज उन्हें दिल्ली के सिंहासन के लिए सुयोग्य लग रहे थे ।

इस कारण जयचन्द अपने नाना और अपने मौसा सम्राट सोमेश्वर दोनो से ही नाराज़ होकर
ये एलान कर दिया कि कन्नौज के अब दिल्ली और अजमेर से सारे सम्बन्ध समाप्त ।
उसके कुछ समय पश्चात अजमेर और गुजरात जो उस समय भीमदेव सोलंकी के अधीन था ,
के बीच भयानक युध्द हुआ जिसमें सम्राट सोमेश्वर चौहान को वीरगति प्राप्त हुई । वो होली का दिन था ।

सम्राट सोमेश्वर के वीरगति प्राप्त करने के बाद कुंवर पृथ्वीराज चौहान का राज्याभिषेक
हुआ एवम वे कुँवर पृथ्वीराज चौहान से महाराज पृथ्वीराज चौहान बन गए ।

मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में आये इस बड़े दायित्व का निर्वहन उन्होंने अपनी माता कर्पूरी
देवी एवं चाचा कान्हदेवजू या कान्हा चौहान की सहायता से बड़े ही उचित रूप से किया ।

तत्पश्चात सम्राट ने गुजरात पर आक्रमण करके वहां के राजा भीमदेव सोलंकी का वध कर
अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लिया परन्तु गुजरात पर अधिकार नही किया उन्होंने
भीमदेव के पुत्र को ही गुजरात सौप दिया । सम्राट पृथ्वीराज चौहान की दरियादिली के
अनेक उदाहरण हमे इतिहास में देखने को मिलते है , ये उनमे से एक महत्वपूर्ण है ।

जयचन्द ने सम्राट पृथ्वी को दिल्ली का शासक बनने के पहले मरवाने का भी प्रयास किया परन्तु
कुँवर पृथ्वीराज चौहान अपनी वीरता एवं पराक्रम से जयचन्द के सारे षडयंत्रो को विफल कर दिए ।
ततपश्चात महाराज अनंगपाल ने अपने कनिष्ठ नाती और हम सबके प्यारे सम्राट पृथ्वीराज
चौहान का दिल्ली के सिंहासन में राज्याभिषेक किया ।

इन्हें अंतिम हिन्दवी शासक इसलिए कहते है , क्योंकि इनके पराजित होने के बाद ही हमारे देश भारत मे
पहली बार किसी विदेशी को सत्ता मिली , इन्हें हराया तो मुहम्मद गौरी ने था ,
परन्तु अपने मित्र चंदबरदाई की सहायता से सम्राट पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को अंधे
होते हुए भी मार गिराया ।

आज भी इनके मित्र चंदबरदाई के द्वारा लिखा गया वो
अंतिम पद याद किया जाता है, जो मुहम्मद गौरी को मारने के लिए उन्होंने कहा था –
“चार बांस , चौबीस गज़ ,अंगुल अष्ट प्रमाण ता ऊपर सुल्तान है , मत चुके चौहान ।

मात्र एक तीर से पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को मार गिराया उसके बाद चंदबरदाई और
सम्राट ने एक दूसरे को खंजर मार के प्राणों की आहूति दे दी ।
सम्राट का कहना था कि किसी विदेशी शत्रु के हाथों मरने से अच्छा है कि मैं अपने
मित्र के हाथों से मरु ।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान कला के प्रेमी थे , एवं संस्कृत के उच्च कोटि के ज्ञाता थे ।
छहो शास्त्रो मे पारंगत माने जाते रहे है ये । इनके बचपन के बारे में एक विशेष बात विख्यात है,
कि इन्होंने बचपन मे ही एक शेर का जबड़ा फाड़ डाला था । बहुत ही वीर थे वो की उस समय
पूरे भारत मे बच्चा बच्चा उनकी वीरता के किस्से सुनाता था ।

मुहम्मद गौरी ने जब सम्राट को कैद कर लिया तो उनके सामने एक प्रस्ताव रखा कि वो
इस्लाम स्वीकार ले और फिर वो मुहम्मद गौरी उसे उसका सब लौटा देंगे पर शर्त थी कि सो
स्वयं इस्लाम स्वीकारेंगे एवं भारत का इस्लामीकरण करेंगे ।


एक तरह से गौरी भारत को अपना ग़ुलाम ही बनाना चाहता था । पर सम्राट को ये स्वीकार
नही हुआ उन्होंने देश के साथ कोई समझौता नही किया उनके अंतिम शब्द जो वस्तुतः
मनुस्मृति के शब्द थे – एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः।

शरीरेण समं नाशं सर्वम् अन्यद्धि गच्छति॥ ८.१७॥ मनुस्मृतिः

अर्थात ,धर्म ही ऐसा मित्र है, जो मरणोत्तर भी साथ चलता है। अन्य सभी वस्तुएं शरीर के साथ
ही नष्ट हो जाती हैं। इतिहासविद् डॉ. बिन्ध्यनाथ चौहान के मत अनुसार पृथ्वीराज
ने उक्त श्लोक का अन्तिम समय पर्यन्त आचरण किया।

1191 ईसवी में मुहम्मद गौरी ने प्रथम आक्रमण किया था दिल्ली पर, पृथ्वीराज चौहान ने
तराइन नामक स्थान पर उससे युद्ध किया और मुहम्मद गौरी को मुह की खानी पड़ी ।
परन्तु 1192 में तराइन के द्वीतीय युद्ध मे जयचन्द जो सम्राट का मौसेरा भाई एवं ससुर भी
था उसके छल के कारण सम्राट को पराजय का सामना करना पड़ा ।

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